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Sunday, October 14, 2012

बांवरा मनं...!




















मन , ऐ मेरे मन...
थोडा ठहर , ज़रा सा थम...
कैसे कैसे छले मोहे, ओ निर्मम...
यूँ तो कहने को है यह मेरा जीवन...
पर जाने क्यूँ और कैसे जीता इसको मन...!


तुझ से ही बनती क्यूँ सोच मेरी....?
क्यूँ तुझ पर आश्रित सब सच मेरे...?
तू ही करे है सब झूठ किनारे...
कैसे रखे है मुझको भटकाए.....!


है बड़ा ही बेबाक और बेशरम...
न कोई दुविधा , न कोई भरम...
न कोई सीमा..न कोई रेखा....
सब कुछ करता यूँ अनदेखा...
जब लगायी कोई रोक-टोक...
तनिक भी न हुआ गति अवरोध...
छलआंगे मार जो बनता हिरन...
फिर न चलता इस पर कोई जतन...!

तनिक ठहर, ज़रा सा थम...
मन, ऐ मेरे मन...
अब समय है, तू मेरी सुन...
अब जो ऐसा हो की :
तू है - कह ,
और मैं हूं - सुन,
और मै ही - चिंतन,

यूँ तो कभी न रखा कोई बही-खता...
फिर ऐसा हो की कुछ समझ नहीं आता...
अब किया जो दर्ज इस नए खाते में...
कुछ बदल छटते और हुई रौशनी इस अहाते में...

अब जो तुझको जीता हूं...
तो लगता है वाकई जीता हूं...
यूँ न समझेगा तू यूँ ही...
क्यूंकि तेरा मन तो होगा नहीं...!

Monday, July 4, 2011

LN3.


तेरे साथ में,
क्या कहें हम,
बारिश से हो गए हैं,

की जब होती है...
तो बस वही होती है...
गर जो नहीं होती है...
तो भी एक आस होती है...!

तुम्हे ढूंढे,
की खुद को ढूंढे,
आलम ये है अब,
की आईने में भी,
तुझसे ही गुफ्तगू होती है...!

Monday, May 23, 2011

LN2


तेरे आने के करम से भी,
क्या कहें अब,
कुछ ख़ास फर्क पड़ता नहीं ,
कुछ देर को,
ये चेहरा और ये आँखें,
रौशन ज़रूर हो जाती हैं,
पर ज़ेहन की वो बातें,
एक जान से कब मुक़म्मल हुई हैं..!

Tuesday, May 17, 2011

LN1


अफ़सोस न कर, मुक़म्मल न होने का...
हैरान भी न हो, उसके सबाब पर...
ग़ालिब, को भी नाम मिला था...
उस उम्र के आखिरी पड़ाव पर...!