Sunday, April 10, 2011

निशब्द..!



















तुम संग चलूँ,
पर कुछ न कहूँ,
चलूँ कभी रेत पर,
चलूँ कभी पानी पर,
पर कुछ न कहूँ...!

उकेरें मिल कर,
किनारा, कभी नदी का..
किनारा कभी समंदर का..
मिल कर उकेरें,
तना, किसी पेड़ का..
तन, एक दुसरे का..

लिखे नाम कभी,
कभी रेत पर..
कभी पानी पर..
कभी हवाओं पर..
लिखे हर वोह बात,
जो कभी कही नहीं,
लिखे और पढ़े, मिल कर..
फिर हँसे, खुल कर...!

ले कर चलूँ, तुझे मैं साथ,
पर कुछ न कहूँ.

कुछ न कहूँ तब भी,
जब गुजरूँ उन छोटी, सजी दुकानों से,
रंगों से जड़ी हर दूकान,
सजाती तुझ पर जो मुस्कान,

चलूँ जब उन पग-डंडियों पर,
कुछ न कहूँ तब भी,
जो पूछे कुछ तू इशारों से,
तो बोलूं मैं निगाहों से,
कुछ कहूँ उन नज़रों से..!

चलूँ जो तेरे साथ,
बिन कुछ कहे,
तो तुम समझ जाओगे न....?

6 comments:

  1. Bahot hi sunder shabdo me likha hai aapne . . . . . Pyar karna aur usse nibhana isse bahot hi aasani se sikh sakte hai . . . . . Nice one

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  2. Kuch ankhein shabdon se bhi kuch aise keh jaana ki door talak kisi khaas ko ehsaas ho jaaye iska jikr bahut hi umdaa tareeke se kiya hai aapne.

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